Monday, February 15, 2010

धरती माँ को बचाएँ

 

मुझे आप लोग माफ कर दीजिए क्योंकि मैनें कुछ महीनों से कोई पोस्ट अपने ब्लाग पर नहीं डाली, लेकिन उसकी वजह है मेरी परीक्षाएं। एक महीना भी नहीं बीतता है की परीक्षाएं दुबारा शुरू हो जातीं है।

वैसे मैं ये बात करना चाह रही थी की जो माँ हमें पालती-पोसती है, उसे हम लोग बहुत प्यार करतें हैं, पर क्या किसी ने आजतक हमारी धरती माँ के बारे में सोचा है...? क्या किसी नें आजतक उनकी सुंदरता बिगड़ते हुए देखा है..? हाँ सबने देखा है, पर किसी ने ये नहीं सोचा कि जो हमारी धरती माँ को बिगाड़ रहा है उसे हम समझाएँ की आप ऐसा मत करिये। ऐसा करनें से हमें और हमारी धरती माँ को नुकसान पहुँच रहा है। लेकिन नहीं, उलटा वो ही उन्हें कूड़ा-कचड़ा से भर कर कहता है की मै मेरी धरती माता को गंदा नहीं होनें दूंगा।

मैं जानती हूँ कि ऐसा होना आसान नहीं है। पर आप थोड़ी-बहुत कोशिश कर सकतें है।

Here are some tips -

At home:

  • Buy only useful things.
  • Take care not to waste food, water and other things.
  • Carry shopping bags along with you when you go to the market.
  • Segregate waste as biodegradable and non-biodegradable.

Waste water

  •  Children should learn to close the water taps after use.
  • Do not use water more than you need.

Over 1.8 billion tonnes of waste are generated each year in Europe. This equals to 3.5 tonnes per person.

Monday, August 17, 2009

काले-काले बादल आए... (कविता)

 

काले-काले बादल आए।

आसमान पर सारे छाए॥

फिर उनने बरसाया पानी।

सुखी हो गऐ सारे प्राणी॥

 

खेतों में हरियाली आई।

सबके मन में खुशियाँ लाई॥

बच्चे बाहर खेलने निकले।

फिसल गई लो बुढ़िया ताई॥

 

बच्चों ने फिर उन्हें उठाया।

उनको उनके घर पहुचाया॥

ताई के घर बटी मिठाई।

बच्चों ने खूब मौज उड़ाई॥

 

आप सब लोग सोच रहे होंगे की मैनें ये कविता किसी किताब में से देख कर लिखी है, लेकिन ऐसा नहीं है। मैने ये कविता अपने स्कूल की मैगजीन के लिये एक साल पहले अपने आप बनायी थी। बस मेरे माता-पिता ने उसमें से गलतियाँ छाँट कर उसमें कुछ नऐ शब्दों को सुझाया था, और इसीलिये मुझे ये कविता अभी तक याद है। बरसात के मौसम में आसमान में तैरते बादलों को देखकर मैने अपनी पहली पोस्ट के रूप में इस कविता को चुना है।

- वागीशा